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Tuesday, November 3, 2009

"तितली की उड़ान"




" होती है तमन्ना तितली की यही,
उड़ने
का उसको आधार मिले,
जो भी देखे सपना वो,
कुछ
हद तक तो साकार मिले,

हसरत को दिल में रखकर,
वो
अपने पंख फैलाती है,
हर फूल की मासूमियत को ,
महसूस
वो करके आती है!!

बेचारी तितली नहीं जानती,
जीवन
उसका छोटा है,
इस
दुनिया में मासूमियत नही,
लोगों
का मन् ही खोटा है!

जब
किसी दिन वो अपने ,
रंग
बिरंगे पर फैलाएगी,
किसी के हाथों से मसल दी जायेगी!!!

खूबसूरत
अरमानों की कमी नही है दुनिया में,
अंधेरे
के शमशानों की भी कमी नही है दुनिया में!

जीवन
है छोटा तो क्या हुआ??
हसरतें
हैं बाकी तो -
आकाश
है विस्तृत, तितली की उड़ान का कोई अंत नही,
उड़ती
वो उड़ती ही जायेगी,किसी के हाथों में नहीं आएगी.....................

Sunday, October 4, 2009

!! Dushera in Bangalore !!!

Dushehra or Duseraa, whatever we call it.... same festivity has a difference in celebration styles when it comes to India. I recently saw and felt "dussera" and its celebrations in bangalore.Its quite different from what i have seen since childhood.
belonging from north India, i am used to eating Channa Dal , chawal with dahi vadaas on the occasion accompanied by paan in the night when many people go to each other's home and greet them. In Bangalore, however they offer prayers to God and offer bali of cock or goat to the goddess Kali for good blessing. That flesh is cooked at home and eaten as 'prashaad". they also offer langars where local people have rice, saambhar etc. This dushehra reminded me of the cultural diversity of the India....and brought me back to the memory lane once again........when i was a kid.burning crackers and eating sweets with my childhood friends.:)

Thursday, September 24, 2009

छोटी फिल्में बड़ा बाज़ार


पिछले कई दशकों से हमारे सिने प्रेमी बड़े बजट की बड़े सितारों वाली फिल्मों को बड़े परदे पर देखकर अपनी जेबों में बड़ा सा छेद कर लेते थे, और संतुष्टि के नाम पर मिलता कुछ ख़ास नही था। बार बार का वही दोहराव और उबाउपन। वही चहेते सितारे और ठुमके लगती हुई हेरोइनेस जिनके हिस्से में अभिनय तो नाम मात्र का ही आता था। पर अब हमारे फ़िल्म जगत में नए निर्देशकों के आने से नई विचारधारा ने जनम लिया है, अब छोटे बजट में ही कई प्रयोगधर्मी फिल्में बन रही हैं और दर्शकों द्वारा पसंद भी की जा रही है। और ये बहुत अच्छे स्तर पर लोगों का मनोरंजन भी कर रही हैं! इन फिल्मों की खासियत है-

१ कसी हुई पटकथा
२ चुस्त संवाद
३ नए चेहरे
४ नए विषय
५.अलग त्रेत्मेंट
६ और ताज़ापन

ऐसी ही फिल्मों में है - दसविदानिया, संकट सिटी, देव डी ...............

ये तो सिर्फ़ कुछ नाम हैं, आज जब बड़े बजट की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुह गिर रही हैं, ये छोटी फिल्में बड़े स्तर पर लोगों द्वारा सराही जा रही हैं! जो की निश्चय ही एक बड़ा बदलाव है!!!

Wednesday, September 23, 2009


!!! मेरी आंखों में सोये सारे ख्वाब जगा दो, मेरा खोया हुआ बचपन फ़िर से लौटा दो!!!!
!!! ज़िन्दगी है खामोश कश्ती की तरह, इसमें भरके रवानगी ज़रा जीने की वजह दो!!!

Monday, June 22, 2009

!!! " इतना तो कमाना ही चाहिए की अपनी जरूरतें पूरी कर सकें"!!!!

"मेरे द्वारा लिखित यह साक्षात्कार १२थ सप्तम्बर २००६ को "दैनिक जागरण के " जागरण सिटी परिशिशिष्ट में प्रकाशित हुआ था! यह मेरी पहली प्रकाशित रचना है!"

नाम - मनु त्रिखा
शिक्षा- ऍम कोम., हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
शैक्षणिक पृष्ठभूमि- प्रोफेशनल बी.कॉम। करने के बाद एक सब ब्रोकर से थेओरेतिकल अनाल्य्सिस में विशेषज्ञता की ट्रेनिंग ली। दो महीने का प्रशिक्षण लेकर पहली नौकरी " कर्वी स्टॉक में की! कम के दूसरे साल में ही शादी हो गयी! उस समय काम के बारे में यह तय नही था की करना है या नही पर ससुराल वालों के सहयोग व प्रोत्साहन से एक बार फ़िर काम करने का मौका मिला! पिछले छः महीने से " religare" में काम कर रही हैं, यह पूंछे जाने पर की ससुराल वालों से किस तरह का सहयोग मिलता है? वो बताती हैं - मेरी सास, देवर, ननद, पति सभी कामकाजी हैं या अपना व्यवसाय करे हैं इसलिए उन्होंने मुझे भी व्यस्त रहने की सलाह दी!

वह अपने मायके वालों का भी सहयोग मानती हैं जिन्होंने उन्हें उच्च शिक्षा दिलाकर इस काबिल बनाया की बह अपने पैरों पर खड़ी हो सकें! निजी और व्यावसायिक जीवा में संतुलन कैसे बनाती हैं? पूंछने पर वे कहती हैं - " फिलहाल तो यही सोचा है की जब तक काम करुँगी ऑफिस और घर के बीच संतुलन बनाने की हर सम्भव करुँगी
क्यूंकि नौकरी के साथ - साथ परिवार मेरी पहली प्राथमिकता है! को दिक्कत नही आती? वह तपाक से जवाब देती हैं - परेशानी की बात ही नही होती यदि परिवार में हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो!

महत्त्वपूर्ण विषयों पर फैसला लेने की बात आने पर वह कहती हैं - "आप एक परिवार में रहते हैं तो आप के द्वारा लिया गया हर निर्णय सीधे तौर पर पूरे परिवार को प्रभावित करता है! इसलिए कोई भी फ़ैसला लेने से पहले सबकी राय जान लेना बहुत आवश्यक है! " मनु के अनुसार वह अपने कम से पूरी तरह संतुष्ट हैं! भविष्य में उन्हें आने कैरियर को आगे ले जाने का अवसर मिले तो वे जरुर इसका लाभ उठाएंगी!

महिलाओं के लिए काम करना कितना जरूरी है? इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं - मंहगाई के इस दौर में हर व्यक्ति को इतना तो कमाना ही चाहिए ताकि वो अपनी और वक्त आने अपर दोसरों की ज़िम्मेदारी ले सके! आर्थिक स्वतन्त्रता महिला को बुरे समय में भी संबल प्रदान करती है और समाज में सर उठा कर जीने लायक बनाती है!महिलाओं को इच्छित क्षेत्र में आगे आना चाहिए और वक्त के साथ ख़ुद को बदलते रहना चाहिए! उन्हें समाज कम एक जागरूक नागरिक बनना चाहिए!

Sunday, June 21, 2009

नायक या खलनायक?????






हमारे समाज में फिल्में और उनसे जुड़े हुए लोगों को असलियत की ज़िन्दगी में भी किसी " हीरो " से कम नही समझा जाता, ये लोग जो भी करते हैं, आम आदमी इनका अनुसरण करता है। बिना सोचे समझे की जो वो सिनेमा हॉल में देखते हैं, वो एक तीन घंटे की फ़िल्म से ज्यादा और कुछ नही है, आम आदमी की इसी प्रशंशा के पात्र बनकर ये " प्रसिद्ध" लोग सफलता के नशे में इतने चूर हो जाते हैं की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी भूल जाते हैं। हमारे आस पास देखें तो ऐसे कई उदाहरन स्वत: ही मिल जायेंगे जिनमें आम आदमी के मौलिक अधिकारों का इन लोगों द्वारा हनन किया जाता है।

उदहारण अनेक हैं, चाहे वो ९७ का चिंकारा मर्डर केस हो या ९१ का मुंबई बोम्ब ब्लास्ट, चाहे वो एक नाबालिग़ लड़की का बलात्कार हो या किसी गरीब को कार के नीचे कुचल डालना। सब एक ही बात की तरफ़ इशारा करते हैं की हमारी कानून व्यवस्था इतनी लचर और घूसखोर है की इन लोगों के मन में उसका जरा भी डर नही है।

फिल्में और साहित्य सदा से ही हमारे समाज का एक प्रभावशाली अंग रहे हैं! और आम लोगोग्न के मन को और विचारधारा को प्रभावित करते रहे हैं, तो इन आम से खास बने लोगों को भी कुछ भी अनुचित करने से पहले अपने गिरेबान में झांकर देख लेना चाहिए ! कथनी और करनी का यही बड़ा अन्तर इन्हें प्रसिद्धि के उस सिंघासन से एक पल में उतार सकता है जिस पर बैठकर ये अपनी जिम्मेदारियां भूल जाते हैं!

Thursday, June 18, 2009

"मेरा सपना"

है ये मेरा सपना, आसमान को छूने का,
है ये मेरा सपना ज़मीन से ऊपर उठने का,
है ये मेरी चाहत करूँ मैं बात परिंदों से,
छू कर देखू उनके पंखों को!

है ये मेरा सपना की मेरी भी एक पहचान हो,
है ये मेरा सपना की इस दिल में कई अरमान हो,
है ये मेरा सपना की कुछ अधूरा न रहे,
है ये मेरा सपना की मेरी आंखों में,
हमेशा ख्वाब रहे!


सपना है ये की सपना ये सपना ही न रह जाए,
इसको पूरा करने की मुझमें हमेशा प्यास रहे,
जब तक है ये प्यास, ना टूटेगी ये आस,
सपने हैं , ताकत है और हिम्मत है अगर,
तो मेरा कोई भी सपना सिर्फ़ सपना न रहे!